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NCERT Class 8 Social Science Chapter 4 भारत में औपनिवेशिक काल Solutions


भारत में औपनिवेशिक काल

1. उपनिवेशवाद क्या है? इस अध्याय या अपनी जानकारी के आधार पर तीन विभिन्न परिभाषाएँ दीजिए।

उत्तर:
(1) जब कोई शक्तिशाली देश किसी दूसरे देश पर अधिकार करके वहाँ अपना शासन स्थापित करता है, उसे उपनिवेशवाद कहते हैं।
(2) जब विदेशी शासक किसी देश के धन, संसाधनों और व्यापार का अपने लाभ के लिए शोषण करते हैं, उसे उपनिवेशवाद कहा जाता है।
(3) जब एक देश दूसरे देश की स्वतंत्रता छीनकर उस पर अपनी संस्कृति, शिक्षा, कानून और व्यवस्था थोप देता है, तो वह उपनिवेशवाद कहलाता है।


2. उपनिवेशवादी शासक प्रायः यह दावा करते थे कि उनका उद्देश्य शासित लोगों को ‘सभ्य’ बनाना था। इस अध्याय में प्राप्त प्रमाणों के आधार पर बताइए कि क्या भारत के संदर्भ में यह सत्य था? क्यों या क्यों नहीं?

उत्तर :
उपनिवेशवादी शासकों का यह दावा कि वे भारतीयों को ‘सभ्य’ बनाने आए थे, भारत के संदर्भ में बिल्कुल सत्य नहीं था। उनका वास्तविक उद्देश्य भारत पर शासन करना, यहाँ की संपत्ति लूटना और अपने देश को लाभ पहुँचाना था।

ब्रिटिश शासन ने भारत का आर्थिक शोषण किया। किसानों से भारी कर वसूले गए, जिससे वे गरीब हो गए। कई भयानक अकाल पड़े जिनमें लाखों लोगों की मृत्यु हो गई, फिर भी अंग्रेजों ने राहत देने के बजाय अनाज विदेश भेजा। भारतीय उद्योगों, विशेषकर कपड़ा उद्योग को नष्ट कर दिया गया ताकि इंग्लैंड के कारखानों का माल बिक सके।

उन्होंने भारतीय शिक्षा, संस्कृति और परंपराओं को हीन बताया और अंग्रेजी शिक्षा थोपकर ऐसे लोगों को तैयार करना चाहा जो अंग्रेजों की सेवा करें। ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाकर भारतीयों में आपसी मतभेद बढ़ाए गए। विद्रोह करने वालों को कठोर दंड दिए गए।

इन सभी बातों से स्पष्ट है कि अंग्रेजों का ‘सभ्य बनाने’ का दावा केवल दिखावा था। वास्तव में उनका शासन शोषण, अत्याचार और स्वार्थ पर आधारित था, जिससे भारत की गरीबी और दुर्दशा बढ़ी।

अतः यह कहना उचित है कि भारत में उपनिवेशवाद ‘सभ्य बनाने’ का नहीं, बल्कि शोषण और लूट का अभियान था।


प्रश्न 3. भारत को उपनिवेश बनाने की ब्रिटिश नीति पूर्ववर्ती यूरोपीय शक्तियों जैसे पुर्तगाली या फ्रांसीसी से किस प्रकार भिन्न थी?

उत्तर :
ब्रिटिशों की नीति अन्य यूरोपीय शक्तियों से अधिक संगठित, योजनाबद्ध और व्यापक थी।

  • पुर्तगाली मुख्यतः व्यापार और धर्म-प्रचार (बलपूर्वक धर्म परिवर्तन) पर ध्यान देते थे।
  • फ्रांसीसी भी व्यापारिक केंद्र बनाकर सीमित राजनीतिक हस्तक्षेप करते थे।
  • परंतु British East India Company ने केवल व्यापार तक सीमित न रहकर धीरे-धीरे राजनीति में हस्तक्षेप किया, ‘फूट डालो और राज करो’, सहायक संधि और हड़प नीति जैसी चालों से पूरे भारत पर शासन स्थापित किया।

अंतर इस प्रकार थे :

  1. व्यापारियों के रूप में आकर शासक बन गए।
  2. भारतीय राज्यों के आपसी झगड़ों का लाभ उठाया।
  3. विशाल प्रशासन, सेना और कर-व्यवस्था स्थापित की।
  4. पूरे भारत का आर्थिक शोषण किया और उसे अपना उपनिवेश बना लिया।

इस प्रकार ब्रिटिश नीति केवल व्यापार नहीं बल्कि पूर्ण राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण की थी।


4. “भारतीयों ने अपने ही दमन का खर्च उठाया।” रेलवे एवं टेलीग्राफ जैसी ब्रिटिश आधारभूत संरचना परियोजनाओं के संदर्भ में इस कथन का क्या तात्पर्य है?

उत्तर :
इस कथन का अर्थ है कि रेलवे, टेलीग्राफ जैसी सुविधाएँ भारतवासियों के हित के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन के लाभ के लिए बनाई गई थीं, और उनका खर्च भी भारतीयों से ही वसूला गया।

  • इन परियोजनाओं का पैसा भारतीय करों से लिया गया।
  • रेलमार्गों का उपयोग कच्चा माल बंदरगाहों तक पहुँचाने और ब्रिटिश माल भारत में बेचने के लिए किया गया।
  • टेलीग्राफ से अंग्रेजों को विद्रोह दबाने और शासन चलाने में सुविधा मिली।
  • सेना और प्रशासन का खर्च भी भारतीयों से लिया जाता था।

अर्थात भारतीयों के पैसे से ऐसी व्यवस्थाएँ बनीं जिनसे उन्हीं पर शासन और दमन किया गया। इसलिए कहा जाता है कि भारतीयों ने अपने ही दमन का खर्च उठाया।


5. ‘फूट डालो और राज करो’ वाक्यांश का क्या अर्थ है? भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा इसे किस प्रकार प्रयोग में लाया गया, उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :
अर्थ : ‘फूट डालो और राज करो’ का अर्थ है लोगों के बीच आपसी मतभेद, ईर्ष्या, संदेह और विभाजन उत्पन्न करके उन पर आसानी से शासन करना। जब जनता एकजुट नहीं रहती, तब शासक के लिए सत्ता बनाए रखना सरल हो जाता है।

भारत में ब्रिटिशों द्वारा प्रयोग :
ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज की कमजोरियों का लाभ उठाया। भारत में पहले से ही विभिन्न राज्य, जातियाँ, धर्म और राजवंश थे। अंग्रेजों ने इन्हीं भिन्नताओं को बढ़ावा दिया और एक पक्ष को दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर दिया। वे कभी एक राजा की सहायता करते, तो कभी दूसरे की। इस प्रकार वे भारतीय राजनीति के मध्यस्थ बनकर धीरे-धीरे सत्ता हथिया लेते थे।

उदाहरण :

  1. प्लासी का युद्ध (1757) –
    अंग्रेज अधिकारी रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर को लालच देकर अपने पक्ष में कर लिया। युद्ध के समय मीर जाफर ने विश्वासघात किया और अंग्रेजों को विजय मिल गई।
  2. उत्तराधिकार विवादों में हस्तक्षेप कर अंग्रेज अपनी कठपुतली शासक बैठाते थे।
  3. हिंदू-मुस्लिम तथा अन्य सामाजिक समूहों के बीच मतभेद बढ़ाकर एकता को कमजोर किया गया।

निष्कर्ष : इस नीति ने भारतीयों की एकता को तोड़ दिया, जिससे अंग्रेज लगभग दो सौ वर्षों तक भारत पर शासन करने में सफल रहे।


6. भारतीय जीवन के किसी एक क्षेत्र को चुनिए, जैसे कृषि, शिक्षा, व्यापार या ग्रामीण जीवन। उपनिवेशवादी शासन ने उसे किस प्रकार प्रभावित किया? क्या आज भी उन परिवर्तनों के कुछ चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं? अपने विचारों को एक लघु निबंध, कविता या चित्र के रूप में व्यक्त कीजिए।

उत्तर :
लघु निबंध – “औपनिवेशिक शासन और भारतीय कृषि”

भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। प्राचीन काल से ही किसान आत्मनिर्भर थे। वे अन्न उगाते थे, पशुपालन करते थे और गाँव की आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करते थे। परंतु ब्रिटिश शासन ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया।

अंग्रेजों ने भारी भूमि-कर लगाए। किसान को फसल हो या न हो, कर देना ही पड़ता था। इससे किसान कर्ज में डूबने लगे। उन्हें खाद्यान्न के स्थान पर नील, कपास, जूट और अफीम जैसी नकदी फसलें उगाने के लिए मजबूर किया गया, जिससे अंग्रेजों को लाभ हो सके। परिणामस्वरूप भोजन की कमी होने लगी और भयानक अकाल पड़े। लाखों लोग भूख से मर गए।

जमींदारी प्रथा ने किसानों का शोषण बढ़ा दिया। किसान अपनी ही भूमि पर मजदूर बन गए। गाँवों की पारंपरिक आत्मनिर्भर व्यवस्था टूट गई।

आज भी इसके प्रभाव दिखाई देते हैं :

  • किसानों पर कर्ज का बोझ
  • नकदी फसलों पर अधिक निर्भरता
  • ग्रामीण गरीबी
  • भूमिहीन मजदूरों की समस्या

7. कल्पना कीजिए कि आप 1857 में एक संवाददाता हैं। रानी लक्ष्मीबाई द्वारा झाँसी में किए गए प्रतिरोध पर एक संक्षिप्त समाचार विवरण लिखिए। यह भी दर्शाइए कि यह विद्रोह किस प्रकार आरंभ हुआ, फैला और समाप्त हुआ- मुख्य घटनाओं एवं नेताओं को रेखांकित करते हुए एक समय-रेखा या चित्रपट बनाइए।

उत्तर :
समाचार विवरण (संवाददाता की शैली में)

झाँसी, जून 1858

झाँसी से प्राप्त समाचारों के अनुसार वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी सेना के विरुद्ध अद्भुत साहस का परिचय दिया है। अंग्रेजों द्वारा झाँसी राज्य को हड़पने के प्रयास के बाद रानी ने संघर्ष का मार्ग चुना। किले की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं सेना का नेतृत्व किया।

घमासान युद्ध में रानी ने पुरुषों के समान कवच धारण कर घोड़े पर सवार होकर शत्रु से मुकाबला किया। अंग्रेजों की भारी सेना के सामने भी उन्होंने हार नहीं मानी। अंततः वे झाँसी से निकलकर अन्य क्रांतिकारियों से मिलीं और युद्ध जारी रखा। रणभूमि में लड़ते-लड़ते उन्होंने वीरगति प्राप्त की, किंतु उनका साहस देशवासियों के लिए प्रेरणा बन गया।

झाँसी की जनता आज भी उन्हें स्वतंत्रता की देवी के रूप में स्मरण कर रही है।

(स्थान : झाँसी)

1857 विद्रोह की समय-रेखा (Timeline)

वर्ष/तिथिघटना
मार्च 1857मंगल पांडेय द्वारा बैरकपुर में विद्रोह
10 मई 1857मेरठ से सैनिक विद्रोह प्रारंभ
मई–जून 1857दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी में विद्रोह फैलना
1857–58झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष
जून 1858रानी लक्ष्मीबाई वीरगति
1859विद्रोह का दमन

(घटना : 1857 का महान विद्रोह)


8. कल्पना कीजिए यदि भारत कभी भी यूरोपीय शक्तियों का उपनिवेश नहीं बना होता, तब यह किस प्रकार अपने पथ पर विकसित हुआ होता? इस विषय पर लगभग 300 शब्दों की एक लघु कथा लिखिए।

उत्तर :
लघु कथा – “स्वतंत्र भारत का स्वप्न”

सन् 1900 का भारत।
सूर्योदय के साथ बनारस के घाटों पर चहल-पहल थी। दूर कपास मिलों की भाप मशीनें चल रही थीं, पर वे किसी विदेशी कंपनी की नहीं, भारतीय व्यापारियों की थीं। सूरत और कालीकट के बंदरगाहों से जहाज़ अरब, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर जा रहे थे। मसाले, वस्त्र और इस्पात फिर से दुनिया में प्रसिद्ध थे।

इस भारत ने कभी विदेशी शासन का बोझ नहीं झेला था। यहाँ के राज्य आपसी सहयोग से महासंघ बना चुके थे। पंचायतें गाँवों का संचालन करतीं और नगरों में आधुनिक विद्यालय तथा गुरुकुल दोनों साथ-साथ चलते। शिक्षा मातृभाषाओं में होती, पर विज्ञान और गणित में भी भारत अग्रणी था।

कृषक अपनी भूमि के स्वामी थे। वे खाद्यान्न के साथ कपास और रेशम भी उगाते। हस्तशिल्पी करघों पर महीन मलमल बुनते, जिनकी माँग यूरोप तक थी। लोहे और इस्पात के कारखाने स्वदेशी तकनीक से चल रहे थे। युवाओं को रोजगार के लिए विदेश नहीं जाना पड़ता था।

दिल्ली में एक सभा हो रही थी जहाँ विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि नई रेल लाइन और विश्वविद्यालय की योजना पर चर्चा कर रहे थे। निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते थे। किसी विदेशी शक्ति का हस्तक्षेप नहीं था।

शाम को एक वृद्ध शिक्षक अपने छात्रों से बोले — “बच्चो, हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारी एकता है। हमने अपने ज्ञान और परंपरा से विकास किया है, इसलिए यह प्रगति हमारी अपनी है।”

छात्र गर्व से मुस्कराए। यह भारत स्वतंत्र था, आत्मनिर्भर था और अपनी संस्कृति तथा विज्ञान दोनों में विश्व का मार्गदर्शक बन चुका था।


9. भूमिका-अभिनय (रोल-प्ले) एक ऐतिहासिक संवाद का मंचन कीजिए जिसमें एक ब्रिटिश अधिकारी एवं एक भारतीय व्यक्तित्व जैसे दादाभाई नौरोजी के मध्य ब्रिटिश उपनिवेशवाद पर चर्चा हो रही हो।

उत्तर :
पात्र :

  • ब्रिटिश अधिकारी
  • दादाभाई नौरोजी (भारतीय राष्ट्रवादी नेता)

संवाद

अधिकारी : मिस्टर नौरोजी, ब्रिटिश शासन ने भारत में रेल, टेलीग्राफ और आधुनिक शिक्षा दी है। क्या यह आपके देश के लिए लाभकारी नहीं है?

नौरोजी : लाभकारी? यदि लाभ होता तो भारत निर्धन क्यों होता जा रहा है? आपकी नीतियाँ हमारी संपत्ति इंग्लैंड भेज रही हैं। मैंने इसे “धन निकासी सिद्धांत” कहा है।

अधिकारी : परंतु हमने कानून और व्यवस्था स्थापित की है।

नौरोजी : कानून तब उपयोगी होता है जब वह जनता के हित में हो। यहाँ तो किसानों से भारी कर वसूले जा रहे हैं, उद्योग नष्ट हो रहे हैं और लोग अकाल से मर रहे हैं।

अधिकारी : रेलवे से व्यापार बढ़ा है।

नौरोजी : रेलवे भारतीयों की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि कच्चा माल बंदरगाह तक पहुँचाने के लिए है, ताकि ब्रिटिश उद्योगों को लाभ मिले।

अधिकारी : तो आप क्या चाहते हैं?

नौरोजी : हम केवल न्याय चाहते हैं — स्वशासन, समान अधिकार और हमारी संपत्ति पर हमारा नियंत्रण। भारत को अपने भाग्य का निर्णय स्वयं करने दीजिए।

अधिकारी (चुप होकर) : शायद हमें आपकी बातों पर पुनर्विचार करना होगा।

नौरोजी : याद रखिए, कोई भी राष्ट्र सदैव पराधीन नहीं रह सकता। स्वतंत्रता हमारा अधिकार है।


10. औपनिवेशिक काल में अपने राज्य या क्षेत्र के किसी स्थानीय प्रतिरोध आंदोलन (जनजातीय, कृषक या रियासती) का अन्वेषण कीजिए। एक विवरण या पोस्टर तैयार कीजिए, जिसमें निम्नलिखित बिंदु सम्मिलित हों-
क्या इसका कोई विशिष्ट कारण था?
आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?
उनकी माँगें क्या थीं?
ब्रिटिश शासन की प्रतिक्रिया क्या थी?
आज यह घटना किस प्रकार स्मरण की जाती है (जैसे स्थानीय उत्सवों, गीतों, स्मारकों के माध्यम से)?

उत्तर :
पोस्टर : “संथाल विद्रोह – अंग्रेजी शोषण के विरुद्ध जनजातीय क्रांति”
आंदोलन का नाम :

संथाल विद्रोह (1855–56)

स्थान : वर्तमान झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल का क्षेत्र

विशिष्ट कारण (Causes)

  • ब्रिटिशों द्वारा भारी कर वसूली
  • साहूकारों और जमींदारों द्वारा शोषण
  • जनजातियों की भूमि छीन लेना
  • जंगलों पर अधिकार समाप्त करना
  • पारंपरिक जीवन और संस्कृति में हस्तक्षेप

इन कारणों से संथालों का जीवन संकट में पड़ गया और उन्होंने विद्रोह का मार्ग चुना।

नेतृत्व (Leaders)

  • सिद्धू मुर्मू
  • कान्हू मुर्मू
  • चाँद और भैरव मुर्मू

इन नेताओं ने हजारों संथालों को संगठित कर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा।

माँगें (Demands)

  • अपनी भूमि और जंगलों पर अधिकार
  • अत्याचारपूर्ण करों की समाप्ति
  • साहूकारों और जमींदारों से मुक्ति
  • स्वतंत्र जीवन और स्वशासन

ब्रिटिश शासन की प्रतिक्रिया (Reaction)

  • सेना भेजकर कठोर दमन
  • गाँव जलाए गए
  • हजारों संथालों की हत्या
  • नेताओं को पकड़कर मृत्युदंड

ब्रिटिश शासन ने अत्यंत क्रूरता से विद्रोह को दबा दिया।

आज कैसे स्मरण किया जाता है?

  • स्थानीय उत्सव और मेलों में संथाल वीरों को याद किया जाता है
  • लोकगीत और नृत्य में उनके साहस का वर्णन
  • स्मारक और मूर्तियाँ स्थापित
  • विद्यालयों और इतिहास में इन्हें स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है

महत्वपूर्ण प्रश्न (Page 83)

1. उपनिवेशवाद क्या है?

उत्तर :
उपनिवेशवाद वह प्रक्रिया है जिसमें कोई शक्तिशाली देश किसी अन्य देश या क्षेत्र पर अधिकार करके वहाँ अपनी बस्तियाँ स्थापित करता है तथा अपने राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नियंत्रण को लागू करता है।

तीन परिभाषाएँ:

  1. किसी देश द्वारा दूसरे प्रदेश पर शासन और संसाधनों का शोषण करना।
  2. विदेशी शक्ति द्वारा स्थानीय जनता की स्वतंत्रता छीनकर अपने कानून, शिक्षा और व्यवस्था थोपना।
  3. व्यापार, सैन्य शक्ति और प्रशासन के माध्यम से दूसरे क्षेत्र को अपने हितों के लिए नियंत्रित करना।

2. यूरोपीय शक्तियों को भारत की ओर आकर्षित करने वाले कारण क्या थे?

उत्तर :
यूरोपीय देशों को भारत की ओर आकर्षित करने के मुख्य कारण:

  • भारत की आर्थिक समृद्धि (मसाले, कपास, रेशम, रत्न, हाथीदाँत, इस्पात आदि)
  • नए व्यापार मार्गों और बाजारों की खोज
  • कच्चे माल की प्राप्ति
  • अधिक लाभ और लूट की संभावना
  • एशिया में राजनीतिक व सामरिक प्रभुत्व स्थापित करना
  • ईसाई धर्म का प्रसार (धर्मांतरण)
  • भौगोलिक व वैज्ञानिक अन्वेषण की जिज्ञासा

3. औपनिवेशिक काल से पूर्व तथा उसके दौरान भारत की आर्थिक एवं भू-राजनैतिक स्थिति क्या थी?

उत्तर :
(क) औपनिवेशिक काल से पूर्व:

  • भारत विश्व की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं में से एक था
  • विश्व जीडीपी में लगभग एक-चौथाई योगदान
  • विकसित कृषि, हस्तशिल्प और वस्त्र उद्योग
  • व्यापक आंतरिक व विदेशी व्यापार
  • शक्तिशाली स्थानीय शासन व्यवस्था और पंचायतें

(ख) औपनिवेशिक काल के दौरान:

  • उद्योगों का पतन और विनाश
  • भारत कच्चा माल सप्लाई करने वाला और ब्रिटिश माल का बाजार बन गया
  • भारी कर और राजस्व शोषण
  • बार-बार अकाल और गरीबी
  • धन का निष्कासन (Drain of Wealth)
  • भारत की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमज़ोर और निर्भर हो गई

4. ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रभुत्व का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर :
ब्रिटिश शासन के प्रभाव:

नकारात्मक प्रभाव:

  • आर्थिक शोषण और धन की लूट
  • उद्योगों का विनाश, बेरोजगारी
  • भीषण अकालों में लाखों मौतें
  • उच्च कर व भूमि व्यवस्था से किसानों की दुर्दशा
  • ‘फूट डालो और राज करो’ नीति से सामाजिक विभाजन
  • पारंपरिक शिक्षा व संस्कृति का पतन
  • अंग्रेजी शिक्षा द्वारा “भूरे अंग्रेज” वर्ग का निर्माण

कुछ सीमित सकारात्मक प्रभाव:

  • रेल, डाक, टेलीग्राफ जैसी सुविधाएँ (मुख्यतः ब्रिटिश हितों के लिए)
  • आधुनिक प्रशासनिक ढाँचा
  • भारत का विश्व से संपर्क बढ़ा
  • राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन का विकास

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