Madhya Pradesh Board Class 9 Hindi Vasanti Solutions Chapter 3 रसखान पदावली

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वासंती कक्षा 9 पाठ 3 रसखान पदावली प्रश्न उत्तर हिंदी


रसखान पदावली अभ्यास-प्रश्न

रसखान पदावली लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रसखान कहाँ जन्म लेना चाहते हैं और क्यों?
उत्तर
रसखान गोकुल में, गोवर्द्धन पर्वत पर. और यमुना के किनारे कदंब की डाल पर जन्म लेना चाहते हैं। यह इसलिए कि उन्हें अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण का दर्शन होता रहे।

प्रश्न 2.
रसखान किस-किस रूप में जन्म लेना चाहते हैं?
उत्तर
रसखान गोकुल गाँव के ग्वालों, नंद की गायों, पत्थर और पक्षी के रूप में जन्म लेना चाहते हैं।

प्रश्न 3.
तीनों लोकों का राज्य कवि किस पर और क्यों न्यौछावर करना चाहता है?
उत्तर
तीनों लोकों का राज्य कवि अपने आराध्य देव श्रीकृष्ण की लकुटी (लाठी) और कामरी पर न्यौछावर करना चाहता है। यह इसलिए कि उसे अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की लकुटी और कामरिया (कामरी) के सामने तीनों लोकों का सुख तुच्छ लगता है।

प्रश्न 4.
गोपियों के छाछ को महत्त्वपूर्ण क्यों बताया गया है?
उत्तर
गोपियों के छाछ को महत्त्वपूर्ण इसलिए बताया गया है कि उससे ही वे अपने प्राण प्यारे कृष्ण को न केवल रिझाती हैं, अपितु नाच भी नचाती हैं।

प्रश्न 5.
कौए को भाग्यशाली क्यों कहा गया है?
उत्तर
कौए को भाग्यशाली कहा गया है। यह इसलिए कि जिस कृष्ण की शोभा पर कामदेव भी अपनी करोड़ों सुंदरताओं को निछावर कर देता है। उस कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी छीनकर ले जाना एक अधम पक्षी. कौए का सचमुच में सौभाग्य है।

रसखान पदावली दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कृष्ण को गिरधारी क्यों कहा जाता है?
उत्तर
गिरधारी अर्थात् गिरिधारी। गिरिधारी में दो शब्द हैं-गिरि और धारी। इसका अर्थ है, पर्वत को धारण करने वाला। भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के क्रोध से ब्रजवासियों की रक्षा करने के लिए गोवर्द्धन पर्वत को अपनी एक अँगुली से उठा लिया था। इसलिए उन्हें गिरधारी (गिरिधारी) कहा जाता है।

प्रश्न 2.
कृष्ण की छवि पर कवि सर्वस्व निछावर करने को तैयार है।’ इस कवन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कृष्ण की छवि पर कवि सर्वस्व निछावर करने को तैयार है। इस कथन के आलोक में हम यह कह सकते हैं कि कविवर रसखान कृष्ण के अनन्य उपासक हैं। उनके वे परम भक्त हैं। वे उन्हें अपने इष्टदेव के रूप में स्वीकार कर चुके हैं। हम यह भली-भाँति जानते और समझते हैं कि जो भक्त जिस किसी ईश्वर को अपने प्राणों के समान समझता है। उसके लिए अपने सभी प्रिय वस्तुओं को यहाँ तक कि अपने प्राणों को भी निछावर करने में देर नहीं करता है। इस दृष्टि से यह कृष्ण की छवि पर कविवर रसखान सर्वस्व निछावर करने को तैयार हैं।

प्रश्न 3.
ईश्वर को अनादि और अनंत क्यों कहा गया है?
उत्तर
ईश्वर सभी प्राणियों का रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता है। उसकी ही रचना सृष्टि है। सृष्टि का रचनाकार होने के कारण उसको अनादि कहा गया है। उसकी रचना का न कोई आरंभ जानता है, न विस्तार और न अंत ही जानता है। इस दृष्टि से वह अनंत है। इस प्रकार ईश्वर को अनादि और अनंत कहा गया है।

प्रश्न 4.
श्रीकृष्ण के बालरूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर
श्रीकृष्ण का बालरूप बड़ा ही अदभुत और आकर्षक है। बालकृष्ण के सिर पर मोर का पंख है। उनके गले में गुंज की माला है। वे पीताम्बर धारण किए हुए हैं। वे लकुटी लिए हुए ग्वालों के साथ गाएँ चरा रहे हैं। वे मुरली की मधुर ध्वनि से सबको मोह रहे हैं। बालक कृष्ण धूल से सने हुए मन को मोह रहे हैं। उनके सिर की बँधी हुई चोटी बहुत सुन्दर लग रही है। वे माखन-रोटी खाते हुए आँगन में इधर-उधर घूम रहे हैं। उनके इधर-उधर घूमने से उनके पैरों की पैंजनी बहुत अच्छी ध्वनि कर रही है। उनकी पीली कछनी मन को छू रही है। उनकी इस अद्भुत सुन्दरता पर रीझकर कामदेव अपनी करोड़ों सुन्दरता को निछावर कर रहा है।

प्रश्न 5.
निम्नांकित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
(क) मानुष हों तो………….कूल कदंब की डारन।
(ख) सेस महेस, गनेस……………पै नाच नचावें।
(ग) मोरपंखा सिर ऊपर…………….धरी अघरा न घरोंगी।
उत्तर
(क) अगर मुझे दूसरी बार मनुष्य का जन्म प्राप्त हो, तो मैं वहीं जन्म लूँ और अपनी पूरी जिन्दगी वहीं बिता दूँ, जहाँ ब्रज-गोकुल के गाँव के ग्वाल-बाल रहते हैं। अगर मनुष्य जन्म न मिले तो फिर मेरा इसमें तो क्या अधिकार है? अर्थात कुछ भी नहीं है, ऐसा होते हुए यदि मुझे पशु-योनि (जन्म) प्राप्त हो तो मेरी यही इच्छा है कि मैं वहीं जन्म लूँ जहाँ प्रतिदिन बाबा नंद की गाएँ चरती हैं। इन्हीं के बीच में सदैव रहकर मैं अपने जन्म को सार्थक कर सकूँ। यदि यह जन्म भी न मुझे मिले तो फिर क्या? यदि मैं पत्थर भी बनूँ तो मेरी यही हदय की इच्छा है कि मैं उसी गोवर्द्धन पर्वत पर जाकर पत्थर बनूं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र के कोप से रक्षा करने के लिए अपनी एक अँगुली से उठा लिया था। इन सबके बावजूद यदि किसी पक्षी का जन्म मिले तो मेरी यही कामना है कि मैं उस यमुना के तट पर स्थित कदम्ब की डालों पर प्रतिदिन दिन-रात बसा करूँ अर्थात् रहा करूँ

(ख) महाकवि रसखान का कहना है कि जिस परम आराध्य देव श्रीकृष्ण के गुणों का गुणगान, शेषनाग, गणेश, महेश (शिव), सूर्य और इन्द्र निरंतर किया करते हैं, जिस श्रीकृष्ण की अनन्त सत्ता को वेद अपने अल्प और किंचित् ज्ञान के फलस्वरूप अनादि, अनंत, अखंड, अछेद और अभेद बतलाया करते हैं। नारद, शुकदेव और व्यास जैसे मुनि-पंडित भी अपने अनंत प्रयल के बावजूद भी जिसके स्वरूप और गति का पता न लगा सके और अंततः हार-थककर बैठ गए, ऐसे महाप्रभु श्रीकृष्ण को ब्रज के अहीरों की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए बार-बार नाच नचाया करती हैं।

(ग) हे सखी! मैं अपने श्रीकृष्ण के समान ही बनकर उन्हें रिझाने के लिए सिर पर मोर के पंखों को मुकुट के समान धारण कर लूँगी। कृष्ण के समान ही गुंजों की माला को गले में पहल लूँगी। उनके जैसे ही पीले वस्त्रों को पहनकर और हाथ में लकुटी (डंडे) को लेकर वृन्दावन में ग्वाल-ग्वालिनों के साथ गाय को चराती हुई इधर-उधर भटकती फिरूँगी। रसखान कवि कह रहे हैं कि उस प्रेम दीवानी गोपी ने अपनी सखी से यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि हे सखी! मेरे कृष्ण जिस प्रकार से मुझसे रीझ जाएँ, मैं ठीक उसी प्रकार से अपनी वेश-भूषा को धारण करने में तनिक भी संकोच नहीं करूँगी, लेकिन तुम इतना तो निश्चय ही जान लो कि मैं किसी भी दशा में अपनी सौतस्वरूप मुरली को कभी भी अपने होठों पर नहीं रखूगी, नहीं रखूगी। भाव यह है कि गोपी कृष्ण पर हर प्रकार से प्रेम दीवानी होते हुए मुरली रूपी सौत को इस प्रेम का भागीदार होना स्वीकार नहीं कर रही है।

रसखान पदावली भाषा-अध्ययन काव्य-सौंदर्य

प्रश्न 1.
(क) पठित पाठ में फिरौहों, चरौं, करौं आदि ब्रजभाषा के शब्द हैं, इनके अर्व लिखिए।
(ख) महेस, गनेस, दिनेस, सुरेस शब्दों को मानक रूप में लिखिए।
(ग) ‘कोटिन हूँ कलधौत के घाम करील की कुंजनि ऊपर बारो।’ इस पंक्ति में अलंकार बताइए।
उत्तर
(क) ब्रजभाषा के शब्द अर्व
फिरौहौं – फिरूँगी
चरौं – चरूँगा
करौं – करूँगा

(ख) शब्द – मानक रूप
महेस – महेश
गनेस – गणेश
दिनेश – दिनेस
सुरेस – सुरेश

(ग) ‘कोटिन हूँ कलधौत के धाम, करील की कुंजनि ऊपर बारो’ पंक्ति में अनुप्रास अलंकार है।

रसखान पदावली योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1. रसखान और सूर के कुछ समाना अर्थी पदों को एकत्र करके उनके अर्थ लिखिए।
प्रश्न 2. रसखान के किसी पद पर कक्षा में लघु नाटिका प्रस्तुत करें।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

रसखान पदावली परीक्षापयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लपूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि का कृष्ण के प्रति अनन्य और अटूट भक्ति-भावना कैसे प्रकट हो रही है?
उत्तर
कवि का कृष्ण के प्रति अनन्य और अटूट भक्ति भावना उसके अनेक ‘जन्मों में कृष्ण के ही पास रहने की प्रबल इच्छा से प्रकट हो रही है।

प्रश्न 2.
गोपी कृष्ण का कौन-सा स्वांग नहीं करना चाहती है?
उत्तर
गोपी कृष्ण की मुरली को अपने होठों पर रखने का स्वांग नहीं करना चाहती है।

प्रश्न 3.
कृष्ण अहीर की लड़कियों के छछिया भरी छाछ पर क्यों नाचते हैं?
उत्तर
कृष्ण अहीर की लड़कियों के छछिया भरी छाछ पर इसलिए नाचते हैं कि वे उनके वश में हो चुके हैं।

प्रश्न 4.
राजभवन का सुख पाकर कृष्ण ब्रज को क्यों नहीं भूल पाते हैं?
उत्तर
राजभवन का सुख पाकर कृष्ण ब्रज को नहीं भूल पाते हैं। यह इसलिए राजभवन का सुख उन्हें ब्रज के सुख के सामने बहुत ही फीका और छोटा लगता है।

प्रश्न 5.
कामदेव किस पर क्या न्यौछावर कर रहा है?
उत्तर
कामदेव कृष्ण की बाल सुन्दरता पर रीझकर अपनी करोड़ों सुन्दरता को न्यौछावर कर रहा है।

रसखान पदावली दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रसखान किस-किस रूप में कहाँ-कहाँ जन्म लेना चाहते हैं और क्यों?
उत्तर
रसखान मनुष्य के रूप में गोकुल के गाँव के ग्वालों के यहाँ, पशु के रूप में नंद की गायों में, पत्थर के रूप में गोवर्द्धन पर्वत पर और पक्षी के रूप में यमुना के किनारे कदंब की डालों पर जन्म लेना चाहते हैं। यह इसलिए कि वे अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की निकटता प्राप्त करते रहें।

प्रश्न 2.
कृष्ण अपने बचपन की लकुटी, कामरिया, ब्रज के बन, बाग और तड़ाक, नंद की गायों को चराने और करील के कुंजों के प्रति क्या-क्या निछावर करने के लिए तैयार हैं और क्यों?
उत्तर
कृष्ण अपने बचपन की लकुटी कामरिया ब्रज के वन, बाग और तड़ाग, नंद की गायों को चराने और करील के कुंजों के प्रति तीनों लोकों के सुख, आठों सिद्धियों, नवों निधियाँ और करोड़ों सोने के महलों को निछावर करने के लिए तैयार हैं

प्रश्न 3.
श्रीकृष्ण का गुणगान निरन्तर करते हुए कौन-कौन पार नहीं पा सके?
उत्तर
श्रीकृष्ण का गुणगान शेषनाग, शिव, गणेश, सूर्य व इन्द्र निरन्तर करते रहते हैं। उनकी अनंत सत्ता को वेद अपने थोड़े-से ज्ञान से अनादि, अनंत, अखंड, अछेद और अभेद बतलाते हैं। नारद, शुकदेव और व्यास जैसे महामुनि भी उनके नाम को रट-रट करके अपनी अनंत कोशिश के बावजूद उनके स्वरूप और गति का पता नहीं लगा सके। इस प्रकार वे उनके विषय में कुछ भी पता लगाने का पार नहीं पा सके।

प्रश्न 4.
‘रसखान-पदावली’ का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘रसखान-पदावली’ महाकवि रसखान द्वारा विरचित है। उनकी इन प्रस्तुत हुई सवैयों में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेमानुराग और अद्भुत सौंदर्य के चित्र हैं। इसके साथ-साथ बाल-लीला का भी बड़ा ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत है। कवि ने बार-बार गोकुल में ही जन्म लेने की इच्छा प्रकट की है। इन सवैयों में गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति अगाध प्रेम तो है ही, उन्हें रिझाने के लिए विविध रूपों का स्वांग समर्पण भाव भी है।

रसखान पदावली कवि-परिचय

प्रश्न
कविवर रसखान का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-कविवर रसखान का पूरा असली नाम सैयद इब्राहीम था। उनका जन्म 1548 में दिल्ली में हुआ था। उनके बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से वल्लभ सम्प्रदाय के अंतर्गत दीक्षा ली थी। उनके काव्य में अच्य वल्लभाचार्य के अनुयायी कृष्ण-भक्त कवियों जैसी प्रेम-माधुरी और भक्ति-शैली से इस बात की पुष्टि होती है। उनके निधन की निश्चित तिथि के विषय में विद्वान एकमत नहीं हैं। अधिकांश विद्वानों ने उनको 85 वर्षों तक जीवित होना स्वीकार किया है। ‘ रचनाएँ-रसखान की निम्नलिखित रचनाएँ हैं

  1. सुजान रसखान
  2. प्रेमवाटिका
  3. दानलीला
  4. स्फुट छंद और संदिग्ध छंद।

काव्यगत विशेषताएँ-कविवर रसखान की काव्यगत विशेषताएँ मध्यकालीन कवियों में महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने काव्य में भक्ति के तीनों रूपों को अर्थात् . रूप-वर्णन, विरह-वर्णन और आत्म-समर्पण को चित्रित किया है। इसके लिए रसखान ने ब्रजभाषा और अवधी भाषा के साथ-साथ कुछ अरबी मिश्रित शब्दों के प्रयोग किए हैं। रसखान की शैली भावात्मक और चित्रात्मक दोनों ही है। उसमें गीतात्मकता की प्रधानता है। प्रवाहमय और गतिशील होने के कारण वह अधिक लोकप्रिय है। रसखान के काव्य में रस, छंद और अलंकार की विविधता है।

साहित्यिक महत्त्व-रसखान हिंदी भक्तिकाव्य की कृष्णाश्रयी काव्यधारा के अधिक महत्त्वपूर्ण कवि हैं। फलस्वरूप वे बहुत लोकप्रिय हैं। इनके प्रेम का चित्रण इतना प्रभावशाली है कि उनके पदों को पढ़कर कोई भी गुनगुनाने लगता है। वास्तव में वे प्रेमरस के खान थे।

रसखान पदावली कविता का सारांश

प्रश्न
रसखान द्वारा विरचित ‘सवैया’ के पदों का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
कविवर रसखान विरचित ‘सवैया’ के पदों में श्रीकृष्ण के प्रति अपार प्रेम की भावना व्यक्त की गई है। इसमें श्रीकृष्ण की अद्भुत सुन्दरता के भी चित्र खींचे गए हैं। श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अपार भक्ति भावना को दशति हुए कवि का कहना है कि वह जिस जन्म में हो, वह अपने प्रभु श्रीकृष्ण से यही चाहता है कि उसे वे अपने ही आस-पास उसे विचरने की कृपा प्रदान करें। इस प्रकार वह पहले पद में मनुष्य का जन्म पाकर गोकुल गाँव के ग्वालों के साथ, पशु का जन्म पाकर नंद की गायों के बीच, पत्थर होने पर श्रीकृष्ण द्वारा धारण किए गए मोवर्द्धन पर्वत पर और पक्षी का जन्म पाकर श्रीकृष्ण का प्रिय स्थान यमुना के तट पर विचरण करना चाहता है। दूसरे पद में वह श्रीकृष्ण द्वारा लकुटी-कम्बल पर तीनों लोकों के सुख को, नंद की गायों को चराते हुए आठों सिद्धि और नवों निधि के सुख और ब्रज के वन, बाग, तड़ाग को बार-बार देखते रहने के सुख के सामने करोड़ों सोने के घरों को करील के कंजों के ऊपर निछावर करने के लिए तैयार होने का उल्लेख है।

तीसरे पद में एक गोपी का दूसरे गोपी का श्रीकृष्ण की मुरली के प्रति सौतिया डाह का वह कथन प्रस्तुत है, जिसमें वह श्रीकृष्णमय होने के लिए उनकी ही तरह मोर के पंख, गले में गुंज की माला, पीताम्बर, लकुटी लेकर गायों और गोपियों के साथ घूमने-फिरने के साथ-साथ वह सब कुछ उसके कहने पर करने के लिए तैयार है, लेकिन वह किसी भी दशा में श्रीकृष्ण की तरह मुरली (अपनी सौत) को अपने ओंठ पर नहीं धारण करेगी। चौथे पद में कवि ने जिस श्रीकृष्ण का यशगान सभी देवता और ऋषि-मुनि व वेद-पुराण करते हुए पार नहीं पाते हैं। उन्हें अहीर की लड़कियाँ छाछ रखने के बर्तन भर छाछ के लिए नाच-नचाने का चित्रण किया है। पाँचवें पद में श्रीकृष्ण के अद्भुत बाल-सौंदर्य और बाल-चरित्र का चित्रण करते हुए कवि ने उसे करोड़ों कामदेव की सुंदरता को निछावर करने वाला कहा है।

रसखान पदावली संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

पदों की सप्रसंग व्याख्या, काव्य-सौंदर्य एवं विषय-वस्तु पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. मानुस हाँ तो वही रसखानि फिरो मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन। .
जो पशु हों तो कहा बस मेरो चौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हों तो वही गिरि को जो धरयो पुर छत्र पुरन्दर धारन ।
जो खग हों तो बसेरो करौं नित कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन॥

शब्दार्थ-मानस-मनुष्य। हौं-मैं। बसौं-निवास करूँ। बस-अधिकार। नित-नित्य। मँझारन-बीच में। पाहन-पत्थर । गिरि-गोवर्द्धन पर्वत । पर्यो-धारण किया। पुरन्दर-इन्द्र। खग-पक्षी। कालिन्दी-यमुना। कूल-किनारे।

प्रसंग-प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘वासंती’ हिंदी सामान्य में संकलित व महाकवि रसखान द्वारा विरचित ‘सवैया’ शीर्षक से है। इसमें कवि ने अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण के प्रति अपनी स्वतंत्र भक्तिभावना को प्रस्तुत करते हुए कहा है कि

व्याख्या-अगर मुझे दूसरी बार मनुष्य का जन्म प्राप्त हो, तो मैं वहीं जन्म लूँ और अपनी पूरी जिन्दगी वहीं बिता दूँ, जहाँ ब्रज-गोकुल के गाँव के ग्वाल-बाल रहते हैं। अगर मनुष्य जन्म न मिले तो फिर मेरा इसमें तो क्या अधिकार है? अर्थात कुछ भी नहीं है, ऐसा होते हुए यदि मुझे पशु-योनि (जन्म) प्राप्त हो तो मेरी यही इच्छा है कि मैं वहीं जन्म लूँ जहाँ प्रतिदिन बाबा नंद की गाएँ चरती हैं। इन्हीं के बीच में सदैव रहकर मैं अपने जन्म को सार्थक कर सकूँ। यदि यह जन्म भी न मुझे मिले तो फिर क्या? यदि मैं पत्थर भी बनूँ तो मेरी यही हदय की इच्छा है कि मैं उसी गोवर्द्धन पर्वत पर जाकर पत्थर बनूं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र के कोप से रक्षा करने के लिए अपनी एक अँगुली से उठा लिया था। इन सबके बावजूद यदि किसी पक्षी का जन्म मिले तो मेरी यही कामना है कि मैं उस यमुना के तट पर स्थित कदम्ब की डालों पर प्रतिदिन दिन-रात बसा करूँ अर्थात् रहा करूँ।

विशेष-

  1. इस पद में उन्हीं वस्तुओं का उल्लेख किया गया है जिनसे श्रीकृष्ण का अटूट सम्बन्ध है। इसलिए श्रीकृष्ण के प्रति कवि की पूरी भक्ति-भावना प्रकट होती है।
  2. ‘बसौ ब्रज-गोकुल गाँव के ग्वारन’ और ‘कालिंदी कूल-कदंब की’ में छेकानुप्रास अलंकार है।
  3. ‘पाहन हौं तो वही गिरि की जो धर्यो कर छत्र पुरंदर-धारन’ में अंतर्कथा है।
  4. भाव और भाषा में मधुरता है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
(ii) प्रस्तुत पद के भाव-सौंदर्य को लिखिए।
(iii) प्रस्तुत पद में किसका उल्लेख हुआ है और क्यों?
उत्तर-
(i) प्रस्तुत पद में कवि का विशुद्ध भाव अपने इष्टदेव के प्रति प्रकट हुआ। है। उसे दर्शाने के लिए कवि ने ब्रजभाषा की प्रचलित शब्दावली को अपनाया है। गोवर्द्धन पर्वत का प्रासंगिक उल्लेख करके स्मरण अलंकार को उपयुक्त स्थान दिया गया है। भक्तिरस के प्रवाह से पूरा पद अधिक सरस और हदयस्पर्शी बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद की भाव-योजना आकर्षक है। उसमें प्रवाह है तो सरसता है। रोचकता है तो स्वाभाविकता है। अलंकारों का चमत्कार है, तो कथन की क्रमबद्धता भी है। इस पद के भावों की सुन्दरता निश्चय ही सराहनीय है।
(iii) प्रस्तुत पद में श्रीकृष्ण के निकटवर्ती वस्तुओं और स्थानों का उल्लेख हुआ है। यह इसलिए उनके प्रति कवि की पूरी रुचि और अधिक लगाव है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद में किसके प्रति क्या भाव प्रकट हुआ है?
(ii) प्रस्तुत पद का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में कवि की अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति-भावना प्रकट हुई है।
(ii) प्रस्तुत पद का मुख्य भाव श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति-भावना को प्रकट करते हुए उसे प्रेरक बनाना है।

2. या लकुटी अरू कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहूँ सिद्धि नवो निधि को सुख नंद की गाय चराय बिसाएँ।
रसखानि कबै इन आँखिन तैं ब्रज के बन, बाग, तडाग निहारौं ।
कोटिन हूँ कलधौत के धाम करील की कुंजनि ऊपर बारौं ।

शब्दार्थ-या-उस। लकुटी-लाठी। तिहूँपुर-पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल। सिद्ध-अलौकिक शक्ति। आटहुँ सिद्ध-आठ सिद्धियाँ-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वाशित्व । निधि-अपूर्व भंडार, वैभव । निधियाँ-नौ प्रकार की कही गई हैं-पद, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व ।कोटिक-करोड़ों। कलधौत के घाम-सोने-चाँदी के महल । बारौं-निछावर करता हूँ।

प्रसंग-पूर्ववत् इसमें कवि ने श्रीकृष्ण के ब्रज के प्रति अनन्य प्रेम का उल्लेख करते हुए कहा है।

व्याख्या-द्वारिका में रहते हुए श्रीकृष्ण को एक दिन ब्रज की याद आ गई। वे उससे व्याकुल होकर रुक्मणी से कह रहे हैं कि उस लाठी और कामरी के लिए मैं तीनों लोकों का राज्य भी एकदम छोड़ देने के लिए तैयार हूँ। नंद की गाय चराने के लिए अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वाशित्व-इन आठों सिद्धियों तथा पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व-इन नवों निधियों के सुख का त्याग करने के लिए तैयार हूँ। जब मैंने अपनी इन आँखों से ब्रज के वन और तालाबों को देखा है, अर्थात् मुझे उनकी याद आई है, तब से मैं उनके लिए इतना आतुर हो गया हूँ कि मैं वैभव के प्रतीक इन करोड़ों सोने-चाँदी के महलों को ब्रज के करील-कुँजों के ऊपर न्यौछावर करता हैं।

विशेष-

  1. ‘ब्रज के वन-बाग’ और ‘करील की कुंजन’ में अनुप्रास अलंकार है। पूरे पद में मुख्य रूप से स्मरण अलंकार है।
  2. ब्रजभाषा की शब्दावली है।
  3. भावात्मक शैली है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य को लिखिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य बताइए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य रसात्मक और आलंकारिक है। ब्रज के प्रति कृष्ण के अनन्य प्रेम-भाव को मुख्य रूप से स्मरण अलंकार से अलंकृत करने के प्रयास में अनुप्रास अलंकार को भी जोड़ दिया गया है। ब्रजभाषा की शब्दावली से भावों को पुष्ट करने में सवैया छंद का प्रयोग सार्थक है। इससे पूरा पद आकर्षक बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-विधान न केवल स्वाभाविक है अपितु प्रेरक भी। अपने बचपन की याद की व्याकुलता सभी को सब कुछ न्यौछावर कर देने के लिए उकसाती है। इस प्रकार के भाव-चित्र निश्चय ही मन को छूने वाले हैं।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद में किसका किसके प्रति भाव प्रकट हुए हैं?
(ii) उपर्युक्त पद का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद में श्रीकृष्ण का ब्रज के प्रति अनन्य भाव प्रकट हुए हैं।
(ii) उपर्युक्त पद का मुख्य भाव है-जन्मभूमि के प्रति पवित्र और सर्वस्व निछावर कर देने की प्रेरणा-शिक्षा देना है।

3. मोरपंखा सिर ऊपर राखिहाँ, गंज की माल गरे पहिरोंगी।
ओढ़ि पीताम्बर ले लकुटी बन, गोधन ग्वारिन संग फिरॉगी।
भावतों बोहि मेरे रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग भरोंगी।
या मुरली मुरलीधर की, अघरान-धरी अधरा न धरोंगी।

शब्दार्च-मोरपंखा-मोर के पंख। ओढि-ढ़ककर। पीताम्बर-पीला वस्त्र । लकुटी-लाठी। ग्वारिन-ग्वालिनी। स्वांग-रूप। मुरलीधर-श्रीकृष्ण । अधरा-होंठों पर। घरौंगी-धारण करूँगी।

प्रसंग-पूर्ववत् । श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबी हुई एक गोपी अपनी एक प्रिय सखी से इस प्रकार कह रही है कि

व्याख्या-हे सखी! मैं अपने श्रीकृष्ण के समान ही बनकर उन्हें रिझाने के लिए सिर पर मोर के पंखों को मुकुट के समान धारण कर लूँगी। कृष्ण के समान ही गुंजों की माला को गले में पहल लूँगी। उनके जैसे ही पीले वस्त्रों को पहनकर और हाथ में लकुटी (डंडे) को लेकर वृन्दावन में ग्वाल-ग्वालिनों के साथ गाय को चराती हुई इधर-उधर भटकती फिरूँगी। रसखान कवि कह रहे हैं कि उस प्रेम दीवानी गोपी ने अपनी सखी से यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि हे सखी! मेरे कृष्ण जिस प्रकार से मुझसे रीझ जाएँ, मैं ठीक उसी प्रकार से अपनी वेश-भूषा को धारण करने में तनिक भी संकोच नहीं करूँगी, लेकिन तुम इतना तो निश्चय ही जान लो कि मैं किसी भी दशा में अपनी सौतस्वरूप मुरली को कभी भी अपने होठों पर नहीं रखूगी, नहीं रखूगी। भाव यह है कि गोपी कृष्ण पर हर प्रकार से प्रेम दीवानी होते हुए मुरली रूपी सौत को इस प्रेम का भागीदार होना स्वीकार नहीं कर रही है।

विशेष-

  1. ‘सौतिया डाह’ नामक नारी सुलभ स्वभाव का कवि ने सजीव और रोचक चित्र प्रस्तुत किया है।
  2. अनुप्रास अलंकार की सुन्दर योजना है।
  3. चित्रात्मक शैली है, और भाषा ब्रजभाषा है।
  4. गोपी का सच्चा प्रेम चित्रित हुआ है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(iii) गोपी ने क्या धारण करने से मना कर दिया और क्यों?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में श्रीकृष्ण की एक अनन्य प्रेमिका गोपी के भावों को कवि ने ब्रजभाषा की शब्दावली से पुष्ट करके उसे अनुप्रास अलंकार से चमत्कृत करने का सार्थक प्रयास किया है। इसके लिए प्रस्तुत हुआ शृंगार रस का प्रवाह बड़ा ही सुंदर है। चित्रात्मक शैली से यह अंश अधिक आकर्षक बन गया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य स्वाभाविक रूप में है। गोपी का कृष्ण के प्रति उमड़ा हुआ प्रेम सात्त्विक और विशुद्ध भावों का है। कृष्ण का स्वांग करने वाली गोपी का कृष्ण की मुरली के प्रति सौतिया डाह नारी स्वभाव के अनुकूल है।।
(iii) गोपी ने अपने होठों पर कृष्ण की मुरली को धारण करने से मना कर दिया है। यह इसलिए कि वह उसे अपनी सौत समझती थी।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद का मुख्य भाव क्या है?
(ii) गोपी ने कृष्ण का स्वांग करने के लिए क्यों कहा?
उत्तर
(i) उपर्युक्त पद का भाव यह है कि कृष्ण का सौंदर्य अद्भुत है। इसलिए वह रोचक है। इसे दर्शाना ही उपर्युक्त पद का मुख्य भाव है।
(ii) गोपी ने कृष्ण को रिझाने के लिए ही उनका स्वांग करने के लिए कहा।

4. सेस महेस गनेस दिनेस सुरेसहू जाहि निरंतर गावें।
जाहि अनादि अनन्त अखंड अछेद अभेद सुवेद बतावें।
नारद लै सुक व्यास रटे पचिहारे तऊ पुनि पार न पावें।
ताहि अहीर की छोहरियों छछिया भरि छाछि पै नाच नचावें।

शब्दार्थ-सेस-शेषनाग। गनेस-गणेश। महेस-शिव । दिनेस-सूर्य । सुरेस-इन्द्र। जाहि-जिसके। अभेद-भेदरहित। अछेद-अमर। अभेद-जिसका रहस्य न जाना जा सके। पचि-कोशिश करके।

प्रसंग-प्रस्तुत सवैया रीतिकालीन रीतिमुक्त काव्यधारा के महत्त्वपूर्ण महाकवि ‘रसखान द्वारा विरचित है। इसमें महाकवि रसखान ने अपने इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत प्रेममय उदारता और भक्त-वत्सलता का चित्ताकर्षक चित्रण किया है।

व्याख्या-महाकवि रसखान का कहना है कि जिस परम आराध्य देव श्रीकृष्ण के गुणों का गुणगान, शेषनाग, गणेश, महेश (शिव), सूर्य और इन्द्र निरंतर किया करते हैं, जिस श्रीकृष्ण की अनन्त सत्ता को वेद अपने अल्प और किंचित् ज्ञान के फलस्वरूप अनादि, अनंत, अखंड, अछेद और अभेद बतलाया करते हैं। नारद, शुकदेव और व्यास जैसे मुनि-पंडित भी अपने अनंत प्रयल के बावजूद भी जिसके स्वरूप और गति का पता न लगा सके और अंततः हार-थककर बैठ गए, ऐसे महाप्रभु श्रीकृष्ण को ब्रज के अहीरों की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए बार-बार नाच नचाया करती हैं।

विशेष-

  1. संपूर्ण पद में क्रमशः अंत्यानुप्रास, छेकानुप्रास और वृत्यानुप्रास अलंकार की सुंदर योजना है।
  2. संपूर्ण पद में भक्ति और श्रृंगार रस का सुंदर प्रवाह है।

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पद में कृष्ण के किस रूप का चित्रण किया गया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद में कृष्ण के असाधारण और सामान्य रूप को चित्रित करने के लिए कवि ने अनुप्रास अलंकारों की झड़ी लगा दी हैं। पूरे पद को हृदयस्पर्शी बनाने के लिए भक्ति रस और शृंगार रस के मिश्रित प्रयोग सचमुच में अनूठे हैं।
(ii) प्रस्तुत पद की भाव-योज़ना पद भक्ति-भावना आधारित है। भाव बड़े ही – चित्ताकर्षक और रोचक होने के साथ गतिशील और विविध हैं।
(iii) प्रस्तुत पद में कृष्ण को दो रूपों में चित्रित किया है-परब्रह्म और गोपियों के प्रेमी के रूप में।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) कृष्ण के परस्पर अलग-अलग स्वरूपों के चित्रण से कवि क्या दर्शाना चाहता है?
(ii) श्रीकृष्ण को ब्रज के अहीरों की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए क्यों नचाया करती हैं?
उत्तर
(i) कवि कृष्ण के परस्पर अलग-अलग स्वरूपों के चित्रण से उनके प्रति अपनी अनन्य भक्ति-भावना को दर्शाना चाहता है।
(ii) श्रीकृष्ण को ब्रज के अहीरों की लड़कियाँ छछिया-भर छाछ के लिए नचाया करती हैं। यह इसलिए कि इससे उन्हें कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेमरस का आनंद प्राप्त होता है।

5. धूरि भरे अति सोभित स्यामंज, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरें अंगना, पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटी।
वा छवि को रसखानि विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि साथ सों ले गयो माखन रोटी।

शब्दार्व-पूर-धूल । स्याम-श्रीकृष्ण । अंगना-आँगन। छवि-सौंदर्य । विलोकत-देखते ही। वारत-निछावर। कोटी-करोड़ों। काग-कौआ।

प्रसंग-पूर्ववत्। एक गोपी अपनी प्रिय सखी से अपने प्राण-प्यारे श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य का उल्लेख करते हुए कह रही है कि

व्याख्या-कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की सुंदरता का वर्णन करती हुई कहती है कि धूल से सने हुए शरीर वाले श्रीकृष्ण अत्यंत शोभायमान थे। ऐसी ही शोभा से युक्त उनके सिर की सुंदर चोटी बनी हुई थी। वे खेलते हुए और माखन, रोटी खाते हुए अपने आँगन में घूम रहे थे। उनके पैरों की पैंजनी बज रही थी। वे पीली लंगोटी पहने हुए थे। उनकी उस समय की शोभा को देखकर कामदेव भी अपनी करोड़ों संदरताओं को उस पर न्यौछावर कर रहा था। हे सखि! उस कौवे का बहत बडा सौभाग्य है जो कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी झपटकर उड़ गया।

विशेष-

  1. कृष्ण की बाल-लीला का सुंदर एवं स्वाभाविक वर्णन है।
  2. ‘वा छवि को ‘रसखानि’ विलोकत, वारत काम कला निधि कोटी’ में व्यतिरेक अलंकार है।
  3. पाठान्तर-चतुर्थ पंक्ति का यह पाठ भी मिलता है।’काग के भाग कहा कहिए हरि हाव सों ले गयो माखन-रोटी।’

1. पद पर आधारित काव्य-सौंदर्य संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) प्रस्तुत पद के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
(iii) श्रीकृष्ण का सौंदर्य कैसा हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद का काव्य-सौंदर्य अनूठा है। यह इसलिए कि उसमें अनुप्रास अलंकार का चमत्कार है, तो शृंगार रस का तीव्र प्रवाह है। चित्रात्मक शैली से सवैया छंद अधिक मनमोहक हो गया है।
(ii) प्रस्तुत पद का भाव-सौंदर्य बाल-स्वभाव के चित्रों से अधिक आकर्षक है बालक कृष्ण का बाल-चरित्र न केवल रिझाने वाला है वरन् उसमें गति, ओज और क्रमबद्धता है।
(iii) श्रीकृष्ण का सौंदर्य कामदेव की करोड़ों सुंदरता को लज्जित करने वाला है।

2. पद पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त पद में कृष्ण के किस रूप का चित्रण हुआ है?
(ii) उपर्युक्त पद का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(i) उपर्युक्त पद में कृष्ण के बाल-रूप का अत्यधिक भावपूर्ण चित्रण हुआ है।
(ii) उपर्युक्त पद का भाव सरल किंतु आकर्षक है। बालक कृष्ण की बाल-लीला का स्वाभाविक, विश्वसनीय और यथार्थमय चित्रण है। इसके द्वारा कवि ने अपनी अनन्य भक्ति-भावना करते हुए इसे प्रेरक स्वरूप प्रदान किया है।


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Madhya Pradesh Board Class 9 Hindi Vasanti Solutions Chapter 3   रसखान पदावली By StudyEducation वासंती  कक्षा 9 पाठ 3 रसखान पदावली प्रश्न उत...

Madhya Pradesh Board Class 9 Hindi Vasanti Solutions Chapter 2 मित्रता

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वासंती कक्षा 9 पाठ 2 मित्रता प्रश्न उत्तर हिंदी


मित्रता अभ्यास-प्रश्न

मित्रता लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वर्तमान समय में व्यक्ति के किस व्यवहार को देखकर हम शीघ्र ही अपना मित्र बना लेते हैं?
उत्तर
वर्तमान समय में व्यक्ति का हँसमुख चेहरा, बातचीत के ढंग, थोड़ी चतुराई या साहस ये दो-चार व्यवहार देखकर हम उसे शीघ्र अपना मित्र बना लेते हैं।

प्रश्न 2.
लेखक ने कुसंग के ज्वर को सबसे भयानक क्यों कहा है?
उत्तर
लेखक ने कुसंग के ज्वर को सबसे भयानक इसलिए कहा है कि वह नीति, सद्वृत्ति और बुद्धि का नाश करता है।

प्रश्न 3.
राजदरबार में जगह न मिलने पर इंग्लैंड का बिद्वान अपने भाग्य को क्यों सराहता रहा?
उत्तर
राजदरबार में जगह न मिलने पर इंग्लैंड का विद्वान अपने भाग्य को इसलिए सराहता रहा कि वह अपनी आध्यात्मिक उन्नति में बाधक बुरे संगति से दूर रहा।

प्रश्न 4.
लेखक ने हमें किन बातों से दूर रहने को कहा है?
उत्तर
लेखक ने हमें अश्लील, अपवित्र और फूहड़ बातों से दूर रहने को कहा है।

मित्रता दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अच्छे मित्र के गुण लिखिए।
उत्तर
अच्छे मित्र के गुण निम्नलिखित हैं :

  1. वह प्रतिष्ठित हो।
  2. वह दृढ़चित्त और सत्य-संकल्प का हो।
  3. उसमें आत्मविश्वास हो।
  4. वह भरोसमंद हो।

प्रश्न 2.
दृढ़चित्त और सत्य संकल्पित व्यक्ति से मित्रता करने के क्या लाभ हैं?
उत्तर
दृढ़चित्त और सत्य संकल्पित व्यक्ति से मित्रता करने से अनेक लाभ हैं। उससे हमें दृढ़ता प्राप्त होती है। हम दोषों और त्रुटियों से बच जाते हैं। हमारे सत्य, पवित्रता और मर्यादा के प्रेम पुष्ट होते हैं। हम कुमार्ग से सचेत हो जाते हैं। हतोत्साहित होने पर हमें उत्साह मिलता है।

प्रश्न 3.
विवेक को कुंठा से बचाने के लिए हमें क्या-क्या करना चाहिए?
उत्तर
विवेक को कुंठा से बचाने के लिए हमें अत्यधिक दृढ़ संकल्प के लोगों के साथ नहीं रहना चाहिए। दूसरी बात यह है कि हमें मनमाने और दबाव डालने वाले लोगों से बचना चाहिए। तीसरी बात यह कि अपनी ही बात को ऊपर रखने वालों से सावधान रहना चाहिए।

प्रश्न 4.
जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं में होनी वाली मित्रता की सार्थकता लिखिए।
उत्तर
बचपनावस्था की मित्रता बड़ी आनंदमयी होती है। उसमें हदय को बेधने वाली ईर्ष्या और खिन्नता नहीं होती है। उसमें अत्यधिक मधुरता और प्रेम की ऊँची तरंगें होती हैं। यही नहीं अपार विश्वासमयी कल्पनाएँ होती हैं। उसमें वर्तमान के प्रति आनंदयम दृष्टि और भविष्य के प्रति आकर्षक विचार भरे होते हैं। छात्रावास या सहपाठी की मित्रता में भावों का भारी उथल-पुथल होता है।

प्रश्न 5.
भिन्न प्रकृति और स्वभाव के लोगों में मित्रता कैसे बनी रहती है?
उत्तर
भिन्न प्रकृति और स्वभाव के लोगों में मित्रता परस्पर अत्यधिक प्रगाढ़ प्रेम के कारण बनी रहती है। जो गुण जिसमें नहीं, वह चाहता है कि उसे ऐसा कोई मित्र मिले, जिसमें वे गुण हों। फलस्वरूप चिंतनशील मनुष्य प्रसन्नचित्त का साथ ढूँढ़ता है। निर्बल बली का और धीर उत्साही का।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए
(अ) ‘लेखक ने विश्वासपात्र मित्र को खजाना, औषधि और माता जैसा कहा है।” स्पष्ट कीजिए।
(ब) “संगति का गुप्त प्रभाव हमारे आचरण पर भारी पड़ता है।”
(स) “ऐसे नवयुवकों से बढ़कर शून्य, निःसार और शोचनीय जीवन और किसका है?”
उत्तर
(अ) “लेखक ने विश्वापात्र मित्र को खजाना, औषधि और माता जैसा कहा है।” लेखक के ऐसा कहने का आशय यह है कि विश्वासपात्र मित्र का महत्त्व असाधारण होता है। जो विश्वासपात्र मित्र होता है, वह हमारे लिए रक्षा-कवच के समान होता है। इसलिए ऐसे मित्र तो बड़े ही भाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त होते हैं। वास्तव में ऐसे मित्र एक खजाने की तरह अपने मित्र की प्रत्येक दशा में सहायता करते हैं।

(ब) संगति का गुप्त प्रभाव हमारे आचरण पर भारी पड़ता है। लेखक के इस कथन का आशय यह है कि अगर हम सुसंगति में रहते हैं, हम दिनोंदिन उन्नति के शिखर पर चढ़ते जाते हैं। इसके विपरीत अगर हम कुसंगति में रहते हैं, तो हम दिनोंदिन अवनति के गड्ढे में गिरते जाएँगे।

(स) “ऐसे नवयुवकों से बढ़कर शून्य, निःसार और शोचनीय जीवन और किसका है?” लेखक के इस वाक्य का आशय यह है कि मनचले युवक हर प्रकार से उद्दण्ड और अशिष्ट होते हैं। वे अपने जीवन की सार्थकता केवल ऐशो-आराम करना समझते हैं। फलस्वरूप वे अपने जीवन को नरक बनाकर न केवल स्वयं के लिए दुःखद साबित होते हैं, अपितु अपने संपूर्ण समाज और वातावरण के लिए भी। इसलिए ऐसे शून्य, निःसार और शोचनीय युवकों से सावधान होकर दूर ही रहना चाहिए।

मित्रता भाषा-अध्ययन

प्रश्न 1.
(क) उत्साह में ‘इत’ प्रत्यय जोड़ने से ‘उत्साहित’ बना है। इसी प्रकार पाठ से छाँटकर प्रत्यय लगाकर पाँच शब्द बनाइए।
(ख) दिए गए शब्दों की वर्तनी शुद्ध कीजिए।
मीत्रता – मित्रता
अपरीमार्जित – ……………….
आशचर्य – ………………..
चतुरायी – …………………
प्रतीष्टित – ………………..
सहानूभूति – ………………
दरबारीयों – ……………
कठिंत – ……………….

(ग) निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।
कोमल, शुद्ध, विश्वास, भारी, सत्य, मर्यादित, लाभ, परिपक्व, असफलता, उपयुक्त, गुप्त, बुरा।

(घ) दिए गए वाक्यांशों के लिए एक-एक शब्द लिखिए
(i) जिस पर विश्वास किया जा सके-विश्वासपात्र
(ii) जो पका हुआ न हो।
(iii) चित्त में दृढ़ता हो।
(iv) जिसका उत्साह नष्ट हो गया हो।
(v) जो पवित्र न हो।
(vi) सत्य में निष्ठा रखने वाला।

उत्तर

(ख) शब्द – शुद्ध शब्द
मीत्रता – मित्रता
अपरीमार्जित – अपरिमार्जित
आशचर्य – आश्चर्य
चतुरायी – चतुराई
प्रतीष्ठित – प्रतिष्ठित
दरबारीयों – दरबारियों
कुंठित – कुंठित।

(ग) शब्द – विलोम शब्द
कोमल – कठोर
शुद्ध – अशुद्ध
विश्वास – अविश्वास
भारी – हल्का
सत्य – असत्य
मर्यादित – अमर्यादित
लाभ – हानि
परिपक्व – अपरिपक्व
असफलता – सफलता
उपयुक्त – अनपयुक्त
गुप्त – प्रकट
बुरा- भला।

(घ) वाक्यांश – एक शब्द
(i) जिस पर विश्वास किया जा सके – विश्वासपात्र
(ii) जो पका हुआ न हो – अपरिपक्व
(iii) चित्त में दृढ़ता हो – दृढ़चित्त
(iv) जिसका उत्साह नष्ट हो गया हो – हतोत्साहित
(v) जो पवित्र न हो – अपवित्र
(vi) सत्य में निष्ठा रखने वाला – सत्यनिष्ठ

मित्रता योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1.
सुसंग और कुसंग संबंधी दोहों को संकलित कर चार्ट बनाकर कक्षा में लगाइए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

प्रश्न 2.
जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग॥

रहीम के इस दोहे का आशय यह है कि सज्जन पर बुरी संगति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। क्या आप इस बात से सहमत हैं? इस तरह के अन्य दोहों का संकलन कर हस्तलिखित पुस्तिका तैयार कीजिए।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

मित्रता परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
युवा पुरुष को मित्र चुनने में कठिनाई कब पड़ती है?
उत्तर
जब कोई युवापुरुष अपने घर से बाहर निकलकर बाहरी संसार में अपनी स्थिति जमाता है, तब पहली कठिनाई उसे मित्र चुनने में होती है।

प्रश्न 2.
विश्वासपात्र मित्र के विषय में एक प्राचीन विद्वान ने क्या कहा है?
उत्तर
विश्वासपात्र मित्र के विषय में एक प्राचीन विद्वान ने कहा है-“विश्वासपात्र मित्र से बड़ी भारी रक्षा रहती है। जिसको ऐसा मित्र मिल जाए, उसे समझना चाहिए कि खजाना मिल गया।”

प्रश्न 3.
मित्र किसे कहते हैं?
उत्तर
मित्र उसे कहते हैं, जो एक सच्चे पथ-प्रदर्शक के समान होता है. जिस पर हम पूरा विश्वास कर सकें।

प्रश्न 4.
सच्चे मित्र की चार विशेषताएँ लिखिए
उत्तर
सच्चे मित्र की चार विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  1. वह प्रतिष्ठित हो।
  2. वह दृढ़चित्त और सत्य-संकल्प का हो।
  3. उसमें आत्मविश्वास हो।
  4. वह भरोसेमंद होना चाहिए।

प्रश्न 5.
प्रस्तुत पाठ से अच्छे मित्रों के तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर
प्रस्तुत पाठ से अच्छे मित्रों के तीन उदाहरण इस प्रकार हैं

  1. राम और लक्ष्मण।
  2. चन्द्रगुप्त और चाणक्य।
  3. राम और सुग्रीव।

प्रश्न 6.
मित्र का कर्त्तव्य क्या बतलाया गया है?
उत्तर
मित्र का कर्त्तव्य इस प्रकार बतलाया गया है, “उच्च और महान, कार्यों में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना, और साहस दिलाना कि हम अपनी-अपनी सामर्थ्य के बाहर काम करते जाएं।”

मित्रता दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मित्रता’ पाठ का भाव उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘मित्रता’ निबंध आचार्य रामचंद्र शक्ल का एक विचारात्मक निबंध है। इस निबंध के द्वारा निबंधकार ने मित्रता के अर्थ, इससे सावधानी, लाभ, आदर्श और आवश्यकता को बतलाने का सफल प्रयास किया है। इस निबंध के द्वारा लेखक ने यह स्पष्ट करना चाहा है कि मित्रता की धुन सभी को होती है और सभी मित्र बनाते हैं लेकिन बहुत कम श्रेष्ठ, लाभकारी और योग्य मित्र सिद्ध होते हैं। अधिकतर तो मित्र ही होते हैं। इसलिए लेखक ने यह सुझाव दिया है कि अच्छी मित्रता करनी चाहिए। सोच-समझकर मित्रता करनी चाहिए। ऐसा इसलिए कि श्रेष्ठ मित्रों के योगदान से जीवन निश्चय ही महान् बनता जाता है।

प्रश्न 2.
‘मित्रता’ निबंध के आधार पर मित्रता से लाभ बतलाइए।
उत्तर
‘मित्रता’ निबंध में आचार्य शुक्ल ने मित्रता से लाभ पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि विश्वासपात्र मित्र जीवन की औषधि और खजाना होता है। मित्र हमारे संकल्पों को दृढ़ और दोषों को दूर, सद्गुणों का विकास करता है। हृदय में सत्य, प्रेम और पवित्रता के भावों को उत्पन्न करता है। वह कुमार्ग से हटाकर सुमार्ग पर ले जाता है। वह निराशा में आशा की ज्योति जलाता है। सच्चे मित्र में एक कशल वैद्य के सभी गुण होते हैं।

प्रश्न 3.
कुसंग का ज्वर भयानक क्यों होता है? सोदाहरण बताइए।
उत्तर
कसंग का ज्वर भयानक इसलिए होता है कि यह केवल नीति और सद्वृत्ति का ही नाश नहीं करता अपितु बुद्धि का भी विनाश करता है। उदाहरण के लिए, किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी जो उसे दिन-रात अवनति के गड्ढे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहू के समान होगी जो उसे निरन्तर उन्नति की ओर उठाती जाएगी।

प्रश्न 4.
‘विश्वासपात्र मित्र से बड़ी भारी रक्षा रहती है’ इस कथन के आधार पर मित्र की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
व्यक्ति का परिचय एक से अधिक व्यक्ति से संभव है, पर मित्र उनमें कोई बिरला ही होता है और मित्रों में भी विश्वासपात्र मित्र तो बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। विश्वासपात्र मित्र ही जीवन में उपयोगी सिद्ध होता है। वह प्रत्येक कठिनाई से हमें उबार सकता है। अपने हितकारी तथा उपदेशों से वह अपने मित्र की कुरीतियों को दूर कर सकता है। इस तरह विश्वासपात्र मित्र से जीवन निश्चय ही सफल हो जाता है।

प्रश्न 5.
मित्र का चुनाव करने में क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?
उत्तर
मित्र बनाते समय सर्वप्रथम उसके आचरण तथा स्वभाव पर ध्यान देना चाहिए। मित्र बनाते समय प्रायः उसकी कुछ अच्छी बातों को देखकर ही, उसे मित्र बना लेते हैं। जबकि हमें जिसे मित्र बनाना हो, उसके सम्बन्ध में पूरी तरह जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जीवन-पथ पर कितने मित्र हमें आगे बढ़ा सकते हैं। अच्छा मित्र जहाँ हमारे जीवन की दिशा ही बदल देता है वहाँ बुरा मित्र हमें गर्त में भी ढकेल सकता है।

प्रश्न 6.
लेखक ने मित्र का क्या कर्त्तव्य बतलाया है?
उत्तर
लेखक ने मित्र के कर्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा कि वह अपने मित्र में साहस, बुद्धि और एकता का भाव उत्पन्न करे। वह जीवन और मरण में अपने मित्र का सहारा बने। वह सत्यशील, न्यायी और पराक्रमी बना रहे। वह अपने मित्र का हर कदम पर सहारा बना रहे। जो अपनी सामर्थ्य से बाहर काम कर जाए। मित्र का कर्तव्य है कि वह अपने मित्र पर पूरा विश्वास करे और उसे धोखा न दे।

प्रश्न 7.
अच्छे मित्र में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?
उत्तर
अच्छे मित्र में निम्नलिखित गुण होने चाहिए

  1. अच्छे मित्र पथ-प्रदर्शक के समान होना चाहिए।
  2. मित्र पर पूरा विश्वास करे।
  3. सच्चा मित्र भाई के समान होता है।
  4. उसमें सच्ची सहानुभूति होती है।
  5. सच्चा मित्र एक के हानि-लाभ को अपना हानि-लाभ समझता है।
  6. सच्चा मित्र जीवन व मरण में सहायक होता है।

मित्रता लेखक-परिचय

प्रश्न 1.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के श्रेष्ठ निबंधकार तथा समीक्षक हैं। आपका जन्म बस्ती जिले के अगोना नामक गाँव में सन् 1884 में हुआ था। इनकी आरम्भिक शिक्षा उर्दू तथा अंग्रेजी में हुई। विधिवत् शिक्षा तो वे इंटरमीडिएट तक ही प्राप्त कर सके। शुक्ल जी ने आरंभ में मिर्जापुर के मिशन स्कूल में पढ़ाया। जब काशी में नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा ‘हिंदी शब्द सागर’ का सम्पादन आरंभ हुआ, तो शुक्ल जी को वहाँ कार्य करने का मौका मिला। फिर हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त हुए तथा विभागाध्यक्ष बने। शुक्ल जी ने अंग्रेजी, बंगला, संस्कृत तथा हिंदी के प्राचीन साहित्य का गंभीर अध्ययन किया।

शुक्ल जी का पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश ‘आनंद-कादम्बिनी’ पत्रिका के संपादन से हुआ। उसका सम्पादन उन्होंने कई वर्षों तक कुशलतापूर्वक किया था। इसके बाद वे नागरी प्रचारिणी सभा में हिंदी शब्द-सागर’ के सहयोगी संपादक नियुक्त हुए थे। इसके बाद आपने ‘नागरी प्रचारिणी’ पत्रिका का कई वर्षों तक कशलता के साथ संपादन किया। साहित्य-सेवा करते हुए शुक्ल जी ने 8 फरवरी 1941 को अंतिम साँस ली।नाएँ-यों तो शुक्ल जी प्रमुख रूप से निबंधकार और समालोचक के रूप में ही सुविख्यात हैं लेकिन इसके साथ ही कवि भी रहे हैं। यह बहुत कम चर्चा में हैं। उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

1. निबंध-संग्रह-

  • विचार-वीथि
  • चिन्तामणि भाग 1-2
  • त्रिवेणी।

2. समालोचना

  • जायसी, सूर और तुलसी पर श्रेष्ठ आलोचनाएँ।

3. इतिहास-

  • हिंदी-साहित्य का इतिहास
  • काव्य में रहस्यवाद।

4. कविता-संग्रह-

  • वसंत
  • पथिक
  • शिशिर-पथिक
  • हृदय का मधुर भार,
  • अभिमन्यु-वध।

5. संपादन-

  • हिंदी शब्द-सागर
  • नागरी-प्रचारिणी पत्रिका
  • तुलसी
  • जायसी।

6. अनुवाद-

  • शशांक
  • बुद्ध-चरित
  • कल्पना का आनन
  • आदर्श-जीवन,

5. मेगास्थनीज का भारतीयवर्षीय वर्णन,
6. राज्य प्रबंध-शिक्षा,
7. विश्वप्रपंच।

भाषा-शैली-शुक्ल जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ साहित्यिक भाषा है। उसमें कहीं-कहीं तद्भव शब्द भी आए हैं। मुख्य रूप से आपकी भाषा गम्भीर, संयत, भावपूर्ण और सारगर्भित है। आपके शब्द चयन ठोस, संस्कृत और उच्च-स्तरीय हैं। उर्दू, अंग्रेजी और फारसी शब्दों के प्रयोग कहीं-कहीं हुए हैं। अधिकतर संस्कृत और प्रचलित शब्द ही आए हैं। शक्ल जी की शैली गवेषणात्मक, मुहावरेदार और हास्य-व्यंग्यात्मक है। इससे विषय का प्रतिपादन सुंदर ढंग से हुआ है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शुक्ल जी की भाषा-शैली विषयानुकूल होकर सफल है।

व्यक्तित्व-शक्ल जी का व्यक्तित्व सर्वप्रथम कविमय व्यक्तित्व था। वह धीरे-धीरे समीक्षक और निबंधकार सहित इतिहासकार के रूप में बदलता गया। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि शुक्ल जी का व्यक्तित्व विविध है। इसीलिए वे एक साथ कई रूपों में देखे जाते हैं। अगर हम संक्षेप में उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना चाहें तो कह सकते हैं कि शुक्ल जी युग-प्रवर्तक प्रधान व्यक्तित्व के धनी साहित्यकार हैं।

प्रश्न 2.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल-लिखित निबंध ‘मित्रता’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
यह निबंध आचार्य रामचंद्र शुक्ल का विवरण प्रधान निबंध है। इसमें मित्र के विषय में अच्छा उल्लेख हुआ है। मित्र-कुमित्र का परिचय देते हुए लेखक ने मित्रता की परिभाषा और महत्त्व को बतलाया है। लेखक के अनुसार जब कोई युवक बाहरी संसार में प्रवेश करता है तो उसे सबसे पहले अपना मित्र चुनने में कठिनाई होती है। जरा-सी असावधानी के कारण कुछ लोगों से उसकी मित्रता हो जाती है। इसकी सफलता उसकी जीवन की सफलता पर निर्भर होती है। ऐसा इसलिए कि जब हम समाज में प्रवेश करते हैं तब हमारा चित्त बहुत ही कच्चा होता है। इसलिए ऐसे लोगों का साथ एकदम बुरा होता है जो हमें नियंत्रित रखते हैं। विवेक के कारण इस बात का डर नहीं रहता लेकिन युवा मन में विवेक बहुत कम होता है।

यह आश्चर्य की बात है कि घोड़े के गुण-दोष को तो लोग परखते हैं, लेकिन मित्र के नहीं। ऐसे लोग मित्रता के उद्देश्य को भूल जाते हैं। एक प्राचीन विद्वान के अनुसार-“विश्वासपात्र मित्र से बड़ी भारी रक्षा होती है। जिसे ऐसा मित्र मिल गया हो, मानो उसे खजाना मिल गया हो। इसलिए हमें अपने मित्रों से यही आशा रखनी चाहिए कि वे हमारे उत्तम संकल्पों को दृढ़ करेंगे। दोषों और त्रुटियों से बचाएँगे और हममें सत्य, पवित्रता और मर्यादा को पुष्ट करेंगे। हमें कुमार्ग से बचाएँगे-यही नहीं हमें हतोत्साह से उत्साह की ओर ले जाएंगे।छात्रावस्था में मित्रता की धुन इतनी सवार रहती है कि मित्र बनाने में आनंद का ओर-छोर नहीं होता है। उस समय मित्रता के आदर्शों को भूल जाते हैं। थोड़ी-सी बातें देखकर झट मित्र बना लेते हैं। ऐसे मित्र जीवन-संग्राम में साथ नहीं देते। वास्तव में मित्र तो एक विश्वासपात्र पथ-प्रदर्शक होता है।

दो मित्रों के बीच में परस्पर सहानुभूति होनी आवश्यक है न कि प्रकृति और आचरण आवश्यक है। इसीलिए राम और लक्ष्मण के परस्पर स्वभाव भिन्न तो रहे लेकिन मित्रता खूब निभी थी। हमें ऐसे मित्रों की खोज करनी चाहिए जिनमें हमसे कहीं अधिक आत्मबल हो। हमें उनका पल्ला उसी प्रकार पकड़ना चाहिए जैसे सुग्रीव ने राम का पकड़ा था। शिष्ट और सत्यनिष्ठ, मृदुल, पुरुषार्थी और शुद्ध बुद्धि वाले ही मित्र भरोसेमंद होते हैं। यही बातें जान-पहचान वालों के भी संबंध में लागू हैं। ऐसे लोगों से ही हम अपने जीवन को आनंदमय और उत्तम बना सकते हैं। जान-पहचान बढ़ा लेना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन जीवन-पथ पर सच्चे प्रेम का सुख और शान्ति प्रदान करने वालों का साथ मिलना निश्चय ही कठिन है।

कुसंग का असर सबसे बढ़कर भयानक होता है, क्योंकि इससे न केवल नीति और सद्वृत्ति का ही अपितु सद्बुद्धि का भी नाश होता है। इसलिए कुसंगति तो पैरों में बँधी हुई चक्की और सुसंगति सहारा देने वाली भुजा के समान होती है। यही कारण है कि कुछ ऐसी ही न पड़ने वाली बुरी बातें कुसंगति से कानों में कुछ ही समय में पड़ जाती हैं जिनसे पवित्रता नष्ट हो जाती है। इतनी जल्दी तो कोई भी अच्छी बात प्रभावित नहीं करती है। इसीलिए हमें ऐसी पूरी कोशिश करनी चाहिए कि हम किसी प्रकार की कुसंगति न करें। यह ध्यान देना चाहिए कि हम किसी प्रकार की बुरी बातों के अभ्यस्त न होवें। शुरू-शुरू में ही आने वाली हर बुरी बातों की छूत से हम बच जावें, एक पुरानी कहावत है

‘काजल की कोठरी में कैसो ही सयानो जाय,
एक लीक काजल की लागि है पै लागि है।”

मित्रता संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

गयांशों की सप्रसंग व्याख्या, अर्वग्रहण संबंधी एवं विषय-वस्त पर आधारित प्रश्नोत्तर

1. हम लोग ऐसे समय में समाज में प्रवेश करके अपना कार्य आरंभ करते हैं, जब कि हमारा चित्त कोमल और हर तरह का संस्कार ग्रहण करने योग्य रहता है। हमारे भाव अपरिमार्जित और हमारी प्रवृत्ति अपरिपक्व रहती हैं। हम लोग कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान रहते हैं, जिसे जो जिस रूप में चाहे, उस रूप में ढाले-चाहे राक्षस बनाए, चाहे देवता।

शब्दार्थ-चित्त-हदय। संस्कार-आदत, स्वभाव। अपरिमार्जित-मलीन। अपरिपक्व-कच्चा।

प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘बाल-भारती’ में संकलित और आचार्य श्री रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘मित्रता’ निबंध से है। इसमें लेखक ने नए-नए

व्यक्ति के अनुभवहीनता के स्वरूप को प्रकाश में लाते हुए कहा है कि

व्याख्या-समाज में प्रवेश करने वाले व्यक्ति लगभग जीवन-क्षेत्र के अनुभव से कोसों दूर रहते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति अपनी अनुभवहीनता को लेकर अपना कार्य आरंभ करते हैं। उस समय ऐसे व्यक्ति अपने हृदय के बहुत ही कोमल, सरस और सरल होते हैं। यही कारण है कि उनकी योग्यता सभी प्रकार की आदतों और प्रभावों को अपनाने में सफल दिखाई पड़ती है। इस प्रकार के व्यक्ति अपने स्वभाव और स्वरूप से मलिन और असुन्दर दिखाई देते हैं। उनकी सभी प्रकार की आदतें भी पूरी कच्ची-ही-कच्ची होती हैं। इसे यों समझा जा सकता है जिस प्रकार कच्ची मिट्टी मूर्ति के समान चुपचाप और सरल होती है और जिसे चाहे जो चाहे वह बना ले। ठीक उसी प्रकार समाज में नया-नया प्रवेश करने वाला व्यक्ति भी स्वयं पर निर्भर न होकर समाज के दूसरे अनुभवी और पुराने लोगों पर ही निर्भर होता है। ऐसे लोगों के हाथ में उस नए व्यक्ति का भाग्य होता है। इसे वे देवता, राक्षस आदि जिसमें चाहें उसे बदल दें।

विशेष-

  1. भाषा में प्रवाह है।
  2. शैली बोधगम्य है।
  3. सभी तथ्य सुझावपूर्ण है।
  4. इस अंश से प्रेरणा मिलती है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) कार्य आरंभ करने के लिए लेखक ने क्या आवश्यक बतलाया है?
(ii) कार्य आरंभ करते समय हमारी प्रवृत्ति कैसी रहती है?
उत्तर
(i) कार्य आरंभ करने के लिए लेखक ने चित्त को अत्यधिक सरस, सरल और कोमल होना आवश्यक बतलाया है। इसके साथ ही उसे यह भी होना आवश्यक बतलाया है कि वह हर प्रकार के संस्कारों को ग्रहण करने योग्य हो।
(ii) कार्य आरंभ करते समय हमारी प्रवृत्ति बहुत ही कच्ची रहती है। उसे किसी प्रकार का अनुभव प्राप्त नहीं हुआ होता है। इस प्रकार वह किसी प्रकार के संस्कारों को तुरंत ही ग्रहण करने लगती है।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) कच्ची मिट्टी की मूर्ति की क्या विशेषता होती है?
(ii) ‘चाहे राक्षस बनाए, चाहे देवता’ का आशय क्या है?
उत्तर
(i) कच्ची मिट्टी की मूर्ति की यह विशेषता होती है कि वह दूसरे के अधीन होती है। वह इतनी सरल, सीधी और शान्त होती है कि उसे कोई कुछ भी रूप या आकार दे दे, वह उसका तनिक भी विरोध न करके उसे चुपचाप स्वीकार कर लेती है।
(ii) ‘चाहे राक्षस बनाए, चाहे देवता’ का आशय यह है कि समाज में प्रवेश करनेवाला हर प्रकार से अनुभवरहित होता है। वह इसीलिए आत्मनिर्भर होकर कोई काम करने में असमर्थ होता है। वह तो अनुभवी लोगों पर पूरी तरह से निर्भर होता है। वह अपने को उन्हीं लोगों को सौंप देता है। अब उनके ऊपर निर्भर होता है कि वे उसे बुरा बनाते हैं या अच्छा।

2. मित्र भाई के समान होना चाहिए जिसे हम अपना प्रीतिपात्र बना सकें। हमारे और हमारे मित्र के बीच सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए। ऐसी सहानुभूति जिससे एक के हानि-लाभ समझे। मित्रता के लिए यह आवश्यक नहीं कि दो मित्र एक ही प्रकार के कार्य करते हों या एक ही रुचि के हों। दो भिन्न प्रकृति के मनुष्यों में बराबर प्रीति और मित्रता रही है।

शब्दार्थ-प्रीति-प्रेम। सहानुभूति-दुःख-सुख समझने का अनुभव। रुचि-इच्छा।

प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘बाल-भारती’ में संकलित आचार्य श्री रामचन्द्र शुक्ल-लिखित ‘मित्रता’ निबंध से है। इसमें लेखक ने मित्र के अच्छे स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि

व्याख्या-मित्र कल्याणकारी और उपकारी होना चाहिए। उसका किया हुआ कल्याण और उपकार निश्चित रूप से सगे भाई के समान होना चाहिए। ऐसा इसलिए कि सगे भाई का कल्याण और उपकार हर प्रकार से प्रीतिकारक सिद्ध होता है। इससे – हमारे और हमारे बने हुए मित्र के बीच परस्पर सही और वास्तविक सहानुभूति का होना परम आवश्यक होता है। इस प्रकार की सहानुभूति के द्वारा ही एक दूसरा अपनी-अपनी हानि-लाभ के विषय में सोच-समझ सकता है अन्यथा नहीं। मित्रता के विषय में यह निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि परस्पर दोनों एक ही प्रकार के कार्य-व्यापार करते हों। यह भी आवश्यक नहीं कि परस्पर दोनों एक ही विचारधारा के हों। मित्र तो एक-दूसरे के विपरीत विचारधारा के होकर भी परस्पर अधिक प्रीतिकारक और कल्याणकारक सिद्ध होते हैं।

विशेष-

  1. भाव सरल और स्पष्ट है।
  2. मित्र के सच्चे स्वरूप का उल्लेख हुआ है।
  3. मित्रता के लिए आवश्यक गुणों का वर्णन हुआ है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) मित्र को भाई के समान क्यों होना चाहिए?
(ii) मित्र के बीच कैसी सहानुभूति होनी चाहिए?
उत्तर
(i) मित्र को भाई के समान होना चाहिए। यह इसलिए कि उससे हम अपना दुःख-सुख कहकर उसमें उसे भागीदार बना सकें।
(ii) मित्र के बीच वह सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए, जो हानि-लाभ का पूरा-पूरा ध्यान रखे।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्त से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) उपर्युक्त गद्यांश में किसका उल्लेख हुआ है?
(ii) मित्रता के लिए मुख्य रूप से क्या आवश्यक है?
उत्तर
(i) उपर्युक्त गद्यांश में सच्चे मित्र के स्वरूप का उल्लेख हुआ है।
(ii) मित्रता के लिए मुख्य रूप से प्रीतिकारक और कल्याणकारक होना आवश्यक है।

3. कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। यह केवल नीति और सद्वृत्ति का ही नाश नहीं करता, बल्कि युद्ध का भी क्षय करता है। किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-रात अवनति के गहे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाह के समान होगी, जो उसे निरंतर उन्नति की ओर उठाती जाएगी।

शब्दार्थ-कुसंग-बुरा संग। सद्वृत्ति-अच्छाई। क्षय-नाश। अवनति-अविकास। बाहु-भुजा। निरन्तर-हमेशा।

प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘बाल-भारती’ में संकलित लेखक आचार्य श्री रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘मित्रता’ निबंध से है। इसमें लेखक ने कुसंगति के भयानक फल को बतलाते हुए कहा है कि
व्याख्या-जो भी व्यक्ति एक बार भी कुसंगति में पड़ जाता है उसके भयानक फलों को भोगने के लिए मजबूर हो जाता है। ऐसा इसलिए कि कुसंगति सभी प्रकार की अच्छाइयों को ही नष्ट करने में लग जाती है। इसलिए इससे, अच्छे-अच्छे सिद्धांतों-संस्कारों और अच्छे उद्देश्यों का विनाश तो होता ही है, इसके साथ-ही-साथ सद्बुद्धि का भी पूरा विनाश होने में तनिक भी देर नहीं लगती है। इसलिए यह कहना बहुत ही उचित है कि किसी भी बुरी संगति वाले अनुभव से ही युवक की कुसंगति बहुत ही दुःखद होती है। यह तो ठीक उसी प्रकार की होती है जिस प्रकार से किसी के पैरों में बंधी हुई चक्की होती है। और वह उसे विकास और सुख की ओर न ले जाकर बार-बार दुःख के गड्ढे में ही गिराती जाती है। लेखक का पुनः कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को अच्छी संगति मिल गई है तो इससे उसको निरंतर भला और सुख ही मिलता जाएगा। इस प्रकार की संगति तो उस भुजा के समान ही होती है जो उसे हर प्रकार से सुख और कल्याण के शिखर पर बैठाने में सहायक होगी।

विशेष-

  1. भाव हृदयस्पर्शी है।
  2. उपदेशात्मक शैली है।
  3. तत्सम शब्दावली की प्रधानता है।
  4. संपूर्ण अंश प्रेरणादायक है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) कुसंगति का असर कैसा होता है?
(ii) कुसंगति का असर सबसे अधिक किस पर होता है और क्यों?
उत्तर
(i) कुसंगति का असर बहुत ही भयानक होने के कारण दुखद होता है। जिस पर कुसंगति का असर पड़ जाता है, उसके नियम-सिद्धान्त समाप्त हो जाते हैं। इससे उसकी सद्वृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं। इस तरह कुसंगति से बुद्धि-विवेक देखते-देखते समाप्त हो जाते हैं।
(ii) कुसंगति का असर युवा-पीढ़ी पर सबसे अधिक पड़ता है। ऐसा इसलिए कि उसकी समझ बहुत कम होती है। उसका चित्त बिल्कुल अविकसित होता है। उसका अनुभव बिल्कुल न के बराबर होता है।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(i) कुसंग क्या होता है?
(ii) कुसंग का क्या फल होता है?
उत्तर-
(i) कुसंग एक भयंकर ज्वर के समान होता है, जिसकी चपेट में आने वालों को केवल हानि उठानी पड़ती है।
(ii) कुसंग का फल बड़ा ही भयानक होता है। इसकी चपेट में प्रायः युवावर्ग आता है। वह कुसंग में पड़कर हानि ही उठाता रहता है। उससे उसका बाहर निकलना असंभव-सा हो जाता है।

4. बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिनके घड़ी भर के साथ से भी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है क्योंकि उतने ही बीच में ऐसी-ऐसी बातें कही जाती हैं जो कानों में न पड़नी चाहिए। चित्त पर ऐसे प्रभाव पड़ते हैं जिनसे उसकी पवित्रता का नाश होता है। बुराई अटल भाव से धारण करके बैठती है। बुरी बातें हमारी धारणा में बहुत दिनों तक टिकती हैं। इस बात को प्रायः सभी लोग जानते हैं कि भद्दे-फूहड़ गीत जितनी जल्दी ध्यान पर चढ़ते हैं उतनी जल्दी कोई गंभीर या अच्छी बात नहीं।

शब्दार्थ-भ्रष्ट-नष्ट। चित्त-हदय। पवित्रता-सच्चाई। अटल-स्थिर। धारणा-विचार। गंभीर-ठोस।

प्रसंग-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘बाल-भारती’ में संकलित लेखक आचार्य श्री रामचंद्र शुक्ल-लिखित ‘मित्रता’ निबंध से है। इसमें लेखक ने अच्छी-बुरी बातों के प्रभाव के विषय में बतलाते हुए कहा है कि

व्याख्या-संसार में अधिकांश लोग ऐसे अवश्य ही मिल जाएँगे जिनका थोड़ा-सा भी साथ अनेक प्रकार के विनाश का कारण बन जाता है। ऐसे लोगों का साथ निश्चय ही सद्बुद्धि को विनष्ट करने में देर नहीं लगाता है। ऐसा इसलिए कि इस थोड़े से ही समय में कुछ ऐसी उलजलूल बातें अवश्य हो जाती हैं जो हर प्रकार से अनुचित और अहितकर ही होती हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बुराई का प्रभाव हृदय-स्थल पर इस तरह से पड़ता है कि इससे कहीं कुछ भी सच्चाई-अच्छाई का नामोनिशान नहीं रह जाता है। यह सब कुछ इसलिए होता है कि जो एक बार भी बुरी बातें हमारे हृदय में प्रवेश कर जाती हैं वे स्थिर और अटल भाव से होती हैं। वे बहुत दिनों तक ज्यों-की-त्यों पड़ी रहती हैं। इसलिए इस बात को सभी मानते और समझते हैं कि भद्दे और गन्दे गीतों के असर इतनी जल्दी और देर तक होते हैं कि ऐसे असर सुंदर और अच्छे गीतों के भी नहीं होते हैं।

विशेष-

  1. अच्छी और बुरी बातों के प्रभाव का आकर्षक उल्लेख है।
  2. तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. शैली बोधगम्य है।
  4. सारा अंश उपदेशात्मक है।
  5. उपमा अलंकार है।

1. गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i)कुसंग का असर किस प्रकार होता है?
(ii) बुराई और अच्छाई में क्या अंतर है?
उत्तर
(i) कुसंग का असर तुरंत पड़ने लगता है। यहाँ तक कि घड़ी भर में ही कुसंग अपना दुष्प्रभाव दिखाने लगता है।
(ii) बुराई और अच्छाई में बहुत बड़ा अंतर है। बुराई में अटलता होती है, जबकि अच्छाई में नहीं। बुराई तुरंत अपना प्रभाव डालती है, जबकि अच्छाई धीरे-धीरे।

2. गद्यांश पर आधारित विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न
(i) बुराई से सबसे पहले क्या हानि होती है?
(ii) उपर्युक्त गांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर
(i) बुराई से सबसे पहले बुद्धि की हानि होती है। इससे अच्छाई की पवित्रता विनष्ट हो जाती है। इससे हमारा सोच-समझ मलिन हो जाती है।
(ii) उपर्युक्त गद्यांश का मुख्य भाव है-कुसंगति और सत्संगति क्या होती है। इसे समझाते हुए सत्संगति का महत्त्व बतलाना।

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